Saturday, July 5, 2008

मुलायम और मनमसोसकर का निशाना

कल तक एक दूसरे की जान के दुश्मन आज दोस्त हो गए हैं। होते भी क्यों नहीं, गरीबी और मज़बूरी कुछ भी करा देती है। लोग गरीबी से तंग आकर आत्महत्या तक कर लेते हैं और मज़बूरी में गधे को बाप तक कह देते हैं। उस हालात से तो अच्छा ही है कि मजबूर को बाप मिल जाए और कंगाल को आटा।
मुलायम और अमर ने बहुत दिनों तक गरीबी झेली है। अब थोड़ा मोल भाव कर सरकार से हाथ मिला लिया तो क्या बुराई? वैसे भी करात एंड पार्टी तो परमाणु करार करने नहीं देती। अब करात जी भी सोच रहे होंगे कि शायद सपा ने यह कोई बदला ही लिया है। हो भी सकता है किसी दिन मुलायम और करात जी उलझ गए हों और अब मुलायम का मौका लग गया।
इससे मुलायम जी कई निशाने लगा गए हैं। सबसे बड़ी बात कि पार्टी की तंगहाली खत्म हो जाएगी। भई चुनावों के लिए धन भी तो जुटाना था। गरीबी में आखिर कितने दिन गुजारते। कंगाली में तो आता भी गीला हो जाता है। एक बात और, मनमोहन जी भी मन मारकर जी रहे थे। कई तो उन्हें मनमसोसकर सिंह कहने लगे थे। उधर से अमेरिका का डंडा और इधर से सीपीएम की दरांती और हथौड़ा। बेचारे मनमसोसकर। खैर अब तो वे घर जाकर ठाठ से सौ सकेंगे। उन्हें कई डाक्टर भी चैन से सोने की सलाह दे चुके थे। अकेले वे ही क्यों मुलायम जी भी चुनावों की तयारी करने में जुट सकेंगे।

1 टिप्पणियाँ:

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

बढिया प्रयास है आपका, धन्यवाद । इस नये हिन्दी ब्लाग का स्वागत है ।
छद्म नाम से ब्‍लाग लिखने के आपके जजबे को मेरा नमस्कार ।
शुरूआती दिनों में वर्ड वेरीफिकेशन हटा लें इससे टिप्पयणियों की संख्या‍ प्रभावित होती है
(लागईन - डेशबोर्ड - लेआउट - सेटिंग - कमेंट - Show word verification for comments? No)
आरंभ ‘अंतरजाल में छत्तीसगढ का स्पंदन’