
कहीं महिलायें बैल बनी हैं
कहीं जल रहे गुडिया के पुतले
कहीं करा रहे लोग मेढकों की शादी
यज्ञ का भी सहारा ले लिया हमने
कहीं मीठे चावल तो कहीं लग रहीं हैं छबीलें
हर आँख में एक इंतज़ार है
इंतज़ार है आसमां से गिरने वाले मोती का
पर, पर... पर......
काश! हमने पेड़ नहीं काटे होते...
तो आज न झेलनी पड़ती ये तपन...
न करना पड़ता बेसब्री से इंतज़ार बूंदों का...
ना रूठता मानसून, ना फसल मुरझाती...
सच कहा आपने हम अपने भौतिक सुखो मे इतनी बढ़ोत्तरी करने लगे है की हमे प्रकृति का ध्यान ही नही रहा..और अब जब ज़रूरत पड़ता है तो हम मानसून मानसून कहते फिरते है..
ये तो पहले ही कहा गया था की जो जितना देता है उसे उतना ही मिलता है..आप का भी कुछ दायित्व है की इस प्रकृति को कुछ दो..फिर देखना बरसात के लिए आप को इस तरह रटने की ज़रूरत ही नही पड़ेगी..
पेड़ लगाओ,धरा बचाओ..जम कर खूब तुम फिर जल पाओ..
बहुत अच्छी रचना !!
umda rachna
achhi rachna !
बहुत बढिया रचना.......
मानव द्वारा प्रकृ्ति का जिस प्रकार से अन्ध दोहन किया जा रहा है,उसका दुष्परिणाम तो भोगना ही पडेगा।
इन टोटकों से पानी नहीं बरसता
मनभावन लेखन अन्दाज
सुन्दर रचना !!
आभार
मुम्बई टाईगर
हे प्रभु यह तेरापन्थ
बिल्कुल सही कहा!!
ना रूठता मानसून, ना फसल मुरझाती...
RIGHT HAI
कम शब्दों में बहुत सुन्दर कविता।