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तो ना रूठा होता मानसून

5:56 PM, Posted by आमीन, 9 Comments


कहीं महिलायें बैल बनी हैं
कहीं जल रहे गुडिया के पुतले
कहीं करा रहे लोग मेढकों की शादी
यज्ञ का भी सहारा ले लिया हमने
कहीं मीठे चावल तो कहीं लग रहीं हैं छबीलें
हर आँख में एक इंतज़ार है
इंतज़ार है आसमां से गिरने वाले मोती का
पर, पर... पर......
काश! हमने पेड़ नहीं काटे होते...
तो आज झेलनी पड़ती ये तपन...
करना पड़ता बेसब्री से इंतज़ार बूंदों का...
ना रूठता मानसून, ना फसल मुरझाती...

9 Comments

विनोद कुमार पांडेय @ June 28, 2009 6:33 PM

सच कहा आपने हम अपने भौतिक सुखो मे इतनी बढ़ोत्तरी करने लगे है की हमे प्रकृति का ध्यान ही नही रहा..और अब जब ज़रूरत पड़ता है तो हम मानसून मानसून कहते फिरते है..

ये तो पहले ही कहा गया था की जो जितना देता है उसे उतना ही मिलता है..आप का भी कुछ दायित्व है की इस प्रकृति को कुछ दो..फिर देखना बरसात के लिए आप को इस तरह रटने की ज़रूरत ही नही पड़ेगी..

पेड़ लगाओ,धरा बचाओ..जम कर खूब तुम फिर जल पाओ..

संगीता पुरी @ June 28, 2009 7:27 PM

बहुत अच्‍छी रचना !!

AlbelaKhatri.com @ June 28, 2009 9:19 PM

umda rachna
achhi rachna !

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" @ June 28, 2009 9:32 PM

बहुत बढिया रचना.......
मानव द्वारा प्रकृ्ति का जिस प्रकार से अन्ध दोहन किया जा रहा है,उसका दुष्परिणाम तो भोगना ही पडेगा।

शरद कोकास @ June 29, 2009 1:22 AM

इन टोटकों से पानी नहीं बरसता

HEY PRABHU YEH TERA PATH @ June 29, 2009 4:30 AM

मनभावन लेखन अन्दाज
सुन्दर रचना !!
आभार
मुम्बई टाईगर
हे प्रभु यह तेरापन्थ

Udan Tashtari @ June 29, 2009 4:52 AM

बिल्कुल सही कहा!!

संजय भास्कर @ October 14, 2009 1:53 PM

ना रूठता मानसून, ना फसल मुरझाती...

RIGHT HAI

संजय भास्कर @ October 22, 2009 6:12 PM

कम शब्दों में बहुत सुन्दर कविता।