हुनर
पहले आदमी बाजार में आया
अपना हुनर बेचने।
फिर औरत भी बाजार पहुंची
खुद को बेचने।
...यह भी आदमी का ही हुनर था।।
खेत
शहर की ओर जाती सड़क से खेत की मिट्टी ने पूछा,
दस साल पहले तू मेरे किसान को ले गई थी,
वह लौटकर नहीं आया।
अगले दिन सड़क किसान को शहर से ले आई।
उसके अगले दिन किसान खेत बेचकर फिर शहर चला गया।।
पेट
किसान के पेट ने कहा-मैं भूखा हूं,
कल से कुछ नहीं खाया।
किसान सोचने लगा-
भगवान गरीब को ऐसा पेट क्यों देता है
जो न गांव में भरता है और न शहर में।।
-सुधीर राघव
(सुधीर राघव की अन्य कविताओं के लिए देखें -
http://sudhirraghav.blogspot.com/
skip to main |
skip to sidebar
Back on top ^
created by Nuvio | Webdesign
दुनाली © 2008 Ken ahlin | Thanks to Blogger Templates | Converted to XML Blogger Template by ThemeLib
adbhut !
abhinav !
umdaa kavitayen............badhaai !
BEHATARIN KAWITAAYE ............BHAW SE SARABOR
nice... poems sir... lage raho
कम शब्दों में बहुत सुन्दर कविता।