घर की रेल
4:37 PM, Posted by सुधीर, One Comment
पिछले २० साल से रेल बजट से यही दिखता है कि रेलवे पूरी तरह से मंत्री की बापौती होती है। मंत्री देश का नहीं एक राज्य का, एक जाति का और संभवतः एक परिवार का ही निकलता है, जिसे धोखे से पूरे देश की प्रगति की कमान सौंप दी जाती है। रेल बजट में पहले हर गाड़ी बिहार जाती थी तो अब इसका रुख पश्चिमी बंगाल की ओर है। अगर यही होना है तो क्यों न रोटेशन सिस्टम शुरू कर दिया जाए, मंत्रालय फिक्स कर दिए जाएं कि अमुक बार अमुक राज्य का ही मंत्री बनाया जाएगा। कमसे कम इससे पूरे देश का विकास तो सुनिश्चित हो जाएगा। ममता, पासवान, नीतीश, लालू और फिर ममता। रेल निरंतर एक विशेष हिस्से में ही प्रगति कर रही है। सिर्फ रेल पटरियों पर ही नहीं मंत्री का प्रभाव भर्तियों पर भी खूब पड़ता है। रेलवे में पिछले बीस साल में भर्ती हुए लोगों के आंकड़े निकाल लीजिए, इनकी तुलना पुराने आंकड़ों से करें। आप पाएंगे कि एक राज्य के लोग अचानक बहुत ही विद्वान हो गए हैं और भर्ती में उनका प्रतिशत बढ़ा है। अन्य राज्य फिसड्डी होते चले गए। यह सब तब होता है, जब हम आस्ट्रेलिया पर नस्लवाद और क्षेत्रवाद का आरोप मढ़ते हैं। हमारे मंत्री और नेता सबसे ज्यादा क्षेत्रवादी आपको दिखेंगे और साथ ही दूसरों पर क्षेत्रवाद का आरोप लगाते भी दिखेंगे। असल में जो खुद क्षेत्रवादी होते हैं, वही दूसरों पर सबसे ज्यादा इसके आरोप लगाते हैं। असल में उनकी दृष्टि यहीं तक सीमित होती है। ममता के रेलमंत्री बनने से उम्मीद की जा सकती है कि रेलवे के परीक्षा परिणाम भी बदलेंगे और अब पश्चिमी बंगाल के परीक्षार्थियों का सफलता प्रतिशत बढ़ेगा। बाकी नॉर्थ, साउथ और वेस्ट वालों को अभी इंतजार करना होगा। वह कब योग्य होंगे यह तो वक्त ही बताएगा। पंजाब और हरियाणा वाले तो पहले इसीके चलते कि यहां अपने को कोई नहीं पूछेगा। लोकसभा की कुल मिलाकर १० या १३ सीट, इनके दम पर कोई कैसे रेलमंत्री बनेगा। इसलिए बेचार चुपचाप विदेश निकल जाते थे। अमेरिका हो, कनाडा हो या इंग्लैंड अपनी योग्यता का परचम भी इन्होंने फहराया, पर रेलवे बोर्ड की परीक्षा पास करना अभी इनके बस की बात नहीं है। परीक्षा तो मुंबईवालों से भी पास नहीं होती, वो तो कहते हैं हमें परीक्षा की सूचना ही नहीं दी जाती। नौकरियों के विग्यापन निकलते थे, महाराष्ट्र में नहीं छपते। वे लड़ाई झगड़े पर उतर आते हैं। क्षेत्रवाद फैलाते हैं। साउथ वाले उत्तर और पूर्व वालों से पहले ही ज्यादा उम्मीद नहीं रखते। इसलिए साइंस और तकनीक में अव्वल बने हुए हैं, क्योंकि सिफारिश के दम पर आप अविष्कार नहीं कर सकते। इसके लिए आपको ही खटना पडे़गा। ममता दीदी से हम यही अनुरोध कर सकते हैं, भले ही आपको बंगाल की मुख्यमंत्री बनना है, मगर आप पूरे देश की रेलमंत्री है। यह पहला बजट तो चलो ठीक है। भविष्य में थोड़ा ध्यान रखिएगा। आप पूरे देश की दीदी हैं। पूरा देश आपको मानता है। इसलिए यहां कोई राज्य पराया नहीं है। पंजाब की दिक्कतें समझें, जो रेल परियोजनाएं २० साल पहले बजट में घषित हुईं, वह अब तक पूरी नहीं करवाई गई हैं। उन्हें उनका घोषित फंड ही नहीं मिल पाया और समय बढ़ने के साथ-साथ लागत बढ़ती गई। पंजाब तो एक उदाहरण देश के अन्य हिस्सों का भी ऐसा ही हाल है।
सिर्फ रेल पटरियों पर ही नहीं मंत्री का प्रभाव भर्तियों पर भी खूब पड़ता है।
SAHI HAI